Thursday, July 24, 2014

National Eligibility Test not to be conducted by UGC now


NEW DELHI: The eligibility examination for college and university lectureship, the National Eligibility Test (NET), will no longer be conducted by the University Grants Commission. The examination, which has been conducted since 1989, for entry-level teaching jobs in the country's higher education institutions will now be administered and conducted by the Central Board of Secondary Education. A decision to this effect was taken at the meeting of the University Grants Commission held on Tuesday. The CBSE will conduct the NET examination scheduled to be held in December. The decision for the UGC to outsource the NET has been on the cards for a while. The CBSE, which conducts several entrance examinations for engineering and medical undergraduate programmes besides the school leaving exams, was chosen for the purpose. A senior official said that given the CBSE's proven record in conducting competitive examinations on a large scale, the UGC decided it would delegate the the task of conducting and administering the NET to it. However, the CBSE has no experience of administering a post graduate level examination. To this end, the UGC has decided to share its resources with the CBSE. The NET examination is conducted in 80 subjects and the questions are geared for the post-graduate student. As many as 20,000 applicants appear for the examination, which is conducted twice a year in June and December. The NET, which was introduced by a government notification in 1988, was instituted to ensure minimum standards for the entrants in the teaching profession and research. At its meeting on Tuesday, the UGC also decided to ask the human resource development ministry for an extension for the July 31 deadline on the working out a course of action for the 41 deemed to be universities that were adjudged as unfit to continue operations by the PN Tandon Committee set up in 2009. On the basis of the Supreme Court's direction, the UGC had constituted a four member committee headed by H Devaraj, Vice-Chairman, UGC to assess whether these 41 institutions could continue to operate. All the institutions have made their presentations, but the committee was unable to arrive at a consensus. Sources said that there were differences of opinion on the approach that the committee should take in assessing these 41 institution. Two members were of the view that the final assessment should be in line with the findings of the Tandon Committee and a committee of officials that had been set up subsequently. The other two members were not in agreement with this approach and were of the opinion that their assessment should be independent of the findings of the previous committee. Other members of the committee are Sanjay Dhande and V.S. Chauhan, both members of the UGC and Amita Sharma, Additional Secretary, ministry of human resource development. The committee was to submit its report by July 31. The UGC has decided to approach the ministry for more time to resolve the differences. Read more at: http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/38912352.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst

Thursday, July 17, 2014

भारत में फैलता कट्टरपंथी आतंकवाद और हिंदू-मुस्लिम संबंधों में समस्याएं


दुनिया में जब आतंकवादी गतिविधियां फैलने लगीं तो अन्य विषयों की तरह यह भी वैज्ञानिक अनुसंधान का मुद्दा बन गया। शुरू में यह माना जाने लगा था कि एक आतंकवादी मनोवैज्ञानिक रूप से अस्थिर या विकार ग्रस्त होता है। उसके व्यक्तित्व की यह रोगग्रस्त स्थिति ही उसे आतंकवाद की ओर ले जाती है। धर्म और मजहब को भी विचारधारा ही माना जाना चाहिए। अंतर केवल यह है कि यह विचारधारा किसी वैज्ञानिक और तर्कसंगत चिंतन प्रणाली का परिणाम नहीं होती। इसकी मुख्य शक्ति आस्था है और क्योंकि आस्था तर्कातीत है, इसलिए किसी भी तर्क से इसे खारिज नहीं किया जा सकता। स्पष्ट है कि यह विचारधाराओं में सबसे सशक्त विचारधारा है। जिसके सामने आधुनिक विश्व की तथाकथित लोकतांत्रिक शासन प्रणालियां कमजोर पड़ती जा रही हैं। व्यक्तिगत तौर पर यहां भी एक व्यक्ति के मन में शिकायत या वंचित होने की भावना ही महत्वपूर्ण कारक होती है। लेकिन वंचना और आक्रोश की इन मूलभूत भावनाओं को मजहब विधिवत एक व्यापक और दूरगामी विचारधारा के मनकों के रूप में इस्तेमाल करता है। मजहब के साथ-साथ अगर जाति और क्षेत्र की भावना भी जुड़ जाए तो आतंक का सहारा लेने के लिए एक जबर्दस्त प्रेरणा स्रोत बन जाता है। फिलीस्तीन में अरबों की लड़ाई यहूदियों के अतिक्रमण के खिलाफ ही आक्रोश नहीं है, वह यहूदी और इस्लाम के टकराव के अतिरिक्त एक जातीय समस्या भी है। कश्मीर में हाल के दशकों में आतंकवाद के पीछे भी ये दोनों कारक हैं। मजहब तो है ही, कश्मीरी जाति की अलग पहचान का मुद्दा भी उसमें शामिल हो चुका है। किसी भी क्षेत्र में आतंकवादी गतिविधि के आरम्भ में प्रशासनिक या स्थानीय कारण हो सकते हैं। हो सकता है कि किसी क्षेत्र में कुछ लोगों ने असंवेदनशील प्रशासन व्यवस्था के विरूध्द बगावत करने के लिए हथियार उठाया हो या उसकी जड़ में छोटा-मोटा लाभ या लोभ काम करता हो। व्यक्तिगत तौर पर एक सामान्य आतंकवादी की शिकायतें भी बहुत छोटी-छोटी होती हैं। अपने गांव के जमींदार, अफसर या शक्तिशाली विधायक के खिलाफ। लेकिन जब उसे यह समझाया जाता है कि यह छोटी समस्याएं दरअसल एक बड़ी समस्या के छोटे आयाम हैं, जब तक उस बड़ी समस्या को हल नहीं किया जाता तब तक यह छोटी समस्याएं बनी रहेंगी। मजहब और जाति अक्सर वह दायरा प्रदान करती है जिनके भीतर उन बड़ी समस्याओं को देखा जा सकता है। अन्याय व्यक्ति के विरूध्द ही नहीं हो रहा है, अन्याय पूरे समूह के विरूध्द, जाति या सम्प्रदाय के विरूध्द हो रहा है। यह बात बहुत से अध्ययनों से सिध्द हो चुकी है कि जब समूह के मूल्य अपना लिए जाते हैं तो व्यक्तिगत मृत्यु का भी अर्थ मिल जाता है। यानी जितना-जितना व्यक्ति अपने मृत्यु के बारे में सोचता है उतना ही वह अपनी जाति, अपनी संस्कृति और अपने मजहब की ओर खिंचता चला जाता है। व्यक्ति के अपने मूल्य शायद कभी भी समाप्त नहीं होते, लेकिन आतंक का रास्ता चुनने के बाद जिस तनावपूर्ण स्थिति में आतंकवादियों को गुप्त रूप से रहना पड़ता है उसमें व्यक्तिगत मूल्यों पर समूह के मूल्य प्राथमिकता प्राप्त कर लेते हैं।
हर सैनिक संगठन अपने सैनिकों को युध्द के दौरान अपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश से काट लेता है, ताकि उस पर पूरे संगठन, देश या राष्ट्र के मूल्यों को थोपा जा सके और लड़ते समय वे ही सर्वोपरि हों। यह बात गैर सैनिक आयुध्दजीवि संगठनों या आतंकवादियों पर और ज्यादा शिद्दत के साथ लागू होती है, क्योंकि एक सामान्य आतंकवादी को ऐसे काम करने पड़ सकते हैं जो उसके पारिवारिक और सामाजिक परिवेश में अस्वीकार हो। वह एक तरह से विरक्त जीवन जीने को मजबूर होता है। आरम्भ में आतंकवादी गुट भले ही व्यापक समाज से अलग-थलग रहने पर मजबूर रहते हों, लेकिन अपनी विचारधारा के आधार पर वे अपने चारों ओर एक समर्थन मंडल तैयार करने में सफल हो जाते हैं। समर्थकों का यह दायरा जितना व्यापक होता है, उतनी ही सफलता आतंकवादी गुटों को मिलती है। समर्थक भले ही हथियार न उठाते हों लेकिन वे एक ऐसा कवच उपलब्ध कराते हैं जिससे काफी हद तक आतंकवादी उस सत्तारूढ़ शक्ति से बचे रहते हैं जिसके खिलाफ उन्होंने युध्द का ऐलान कर रखा होता है। प्रशासन और सेना में भी सेंध लगाने, उसमें घुन की तरह छिपकर खोखला करने, खुफिया जानकारी देने और आवश्यकता पड़ने पर राजनैतिक प्रश्रय देने की व्यवस्था, यही समर्थक मंडल करता है। अधिनायकवादी व्यवस्थाओं में सत्ता और आतंकवादियों के बीच मोर्चाबंदी बिल्कुल स्पष्ट होती है लेकिन लोकतांत्रिक देशों में शासन व्यवस्था की विसंगतियों के कारण आतंकवादियों और उनके समर्थक मंडल को एक अराजकता की स्थिति पैदा करने में अधिक सफलता मिल जाती है।
आतंकवादी इक्का-दुक्का हिंसा की घटनाओं को बाकायदा युध्द में बदलने की कोशिश करता है। अक्सर ऐसी स्थिति में सत्तारूढ़ पक्ष आवश्यकता से अधिक हिंसा का इस्तेमाल करता है। लेकिन इस हिंसा के साथ आतंकवादियों को उसके सम्प्रदाय या वर्ग का प्रतिनिधि घोषित करके पूरे सम्प्रदाय या वर्ग को दोषी ठहराने की प्रवृति बढ़ जाती है। यह आतंकवाद से लड़ने का सबसे गलत तरीका है। मध्य एशिया में इराक में और अफगानिस्तान में अमेरिकी नीति का असर यही हुआ है कि अधिकतर देशों के मुसलमान अमेरिका के खिलाफ एकजुट होते दिखाई दे रहे हैं। जो आतंकवाद आज भारत समेत अनेक देशों के लिए गंभीर समस्या बना हुआ है उसकी कुछ विशेषताएं असाधारण हैं। बीसवीं सदी में मुसलमानों में नवजागरण की लहर आरम्भ हुई। इसके कुछ अच्छे परिणाम निकले और कुछ मुस्लिम देश आधुनिक राष्ट्रों की पंगत में जा पहुंचे। वहीं मुस्लिम समाज को कट्टरपंथ की ओर ले जाने के अभियान भी चले। यह अभियान उन देशों में ज्यादा प्रभावी दिखाई दिए जिनमें राजनैतिक कारणों से पश्चिम का आधिपत्य था। पश्चिम में मुसलमानों और ईसाईयों के बीच क्रूसेड और जेहाद का इतिहास रहा है, इसी टकराव की भावना में जेहाद का वह नया रूप विकसित किया जो अधिकतर आतंकवादी संगठनों या आंदोलनों का मूल प्रेरणा स्रोत है। इस्लाम के शुरूआती दौर में जब टकराव यहूदी और ईसाई समुदायों से था और जब मुसलमानों को अपने पांव जमाने के लिए नए मजहब को सख्ती से लागू करने की जरूरत महसूस हुई थी, तब जेहाद गैर मुस्लिमों के लिए युध्द घोष के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा। लेकिन बाद के समय में विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों के साथ मेलजोल का दौर चल पड़ा जिसमें जेहाद की इतनी स्पष्ट परिभाषा नहीं रह गई। अधिकतर प्रगतिशील और उदारवादी मुसलमान नेताओं ने जेहाद को विधर्मियों के खिलाफ युध्द नहीं माना। लेकिन कट्टरता के लौट आने के साथ ही जेहाद एक धर्म युध्द का रूप लेने लगा। अपनी शक्तिशाली या बहुसंख्यक विरोधियों के खिलाफ मुसलमानों को एकजुट करने के लिए इस हथियार का इस्तेमाल राजनैतिक स्तर पर किया जाने लगा है।मुस्लिम आबादी के प्रति देश के जनता में जहर घोलने और किसी भी तरह के आतंकवादी हमले के पीछे इस्लामिक कट्टरपंथी ताकतों के शामिल होने का फ़तवा जारी करने वाली मुख्य धारा मीडिया की भूमिका यहाँ बहुत घिनौनी हो जाती है और कई सवाल खड़े करती है। मीडिया खुले तौर पर साम्पदायिक ध्रुवीकरण के औजार की तरह काम कर रही है। नवउदारवादी ढांचे पर खड़े भारत के मुख्य धारा मीडिया से यह उम्मीद करना तो बेईमानी होगा कि वह आतंकवाद को एक लॉजिक की तरह समझकर उसके कारणों और उससे निपटने के लिए किये जा रहे उपायों का सही विश्लेषण कर एक निष्पक्ष तस्वीर हमारे सामने रखे। लेकिन उससे किसी धर्म विशेष को आतंकवाद का पर्याय बताने से पहले थोडा जिम्मेदार रहने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। इतिहासकारों और राजनीतिक चिंतकों ने पहले ही इस बात को सिद्ध किया है कि कैसे मध्य-पूर्व के अधिकांश देशों में साम्राज्यवादी दबाव और उसके क्रांतिकारी प्रतिरोध के न होने के कारण इस्लामी कट्टरपंथ पनपा है और उसे जनाधार भी प्राप्त हुआ है। हमास, हिजबुल्ला, तालिबान,अलकायदा ये सभी ऐसी ही कट्टर पंथी ताकतें हैं। इन ताकतों को उन सभी देशों की मुस्लिम आबादी का समर्थन और हमदर्दी मिलती है जो साम्रज्यवादी दबाव या देशी शासन का कहर झेल रहे हैं। कभी शांति स्थापित करने के नाम पर तो कभी आंतंकवाद का खात्मा करने के नाम पर अमरीका ने दुनिया भर में अपनी सैन्य शक्ति के बल पर मन-मुताबिक़ सत्ता-परिवर्तन करवाए हैं। जिस दिन अमरीका ने आतंकवादी हमले के चलते अपने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को तबाह होते देखा ठीक उसी दिन अमरीका ने चिली में सत्ता-परिवर्तन करवाया था। अमरीका की साम्राज्यवादी नीतियों के चलते ही मध्य-पूर्व और विचारणीय मुस्लिम आबादी वाले देशों में इस्लामी कट्टरपंथी आतंकवाद पैदा हुआ और जब तक साम्रज्यवाद का दबाव और उत्पीडन मौजूद रहेगा तब तक ऐसे आतंकवाद का कारण और आधार मौजूद रहेगा। भारतीय सरकार ने 16 जुलाई को हुए मुंबई आतंकवादी हमले के बाद भारत दौरे पर आई अमरीका की विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन से ऐसे शिकायतें कीं मानो अमेरिका दुनिया भर का अभिभावक हो। इसके अतिरिक्त भारत ने तमाम अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अमेरिका-समर्थक अवस्थिति अपनाई है। अमरीका में 11सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले को 9/11 कहा गया और इसी तर्ज पर भारतीय मीडिया ने भी 2009 में मुंबई आतंकी हमलों को 26/11 का नाम दिया। यानी हमारे दुःख और संताप की भाषा भी अमरीकी है। हम हंसना भी अमरीकी भाषा में चाहते हैं और रोना भी उसी भाषा में ऐसी स्थिति में हमारी नियति में जो आतंकवाद होगा वह भी अमरीकी ही होगा। अब अहम सवाल यह है कि आखिर आतंकवादियों के मंसूबों पर पानी कैसे फेरा जाए। इसके लिए तो सबसे पहले देश के खुफिया तंत्र को मजबूत करने की दरकार है। इसके अलावा सुरक्षा-व्यवस्था को तो मजबूत करना ही होगा। अपने यहां हर आतंकी वारदात के बाद ठोस कदम उठाने का राग अलापा जाता है और कुछ दिन बाद सब लोग इस मसले पर खामोश हो जाते हैं और मौका पाते ही आतंकवादी फिर हमला करने में कामयाब हो जाते हैं। जनता यदि सही सोच के साथ सही दिशा में बढ़े तो बड़ी से बड़ी समस्या को भी सुलझा लेती है। इसी उम्मीद के साथ हमें अभी आतंकवाद से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसका सावधानी और समझदारी से मुकाबला करने की जरूरत है। अल कायदा मध्य पूर्व एशिया, उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में अपनी गहरी पैठ बना चुका है। अल कायदा ने मीडिया, इंटरनेट के सहारे मुस्लिम उत्पीड़न की अवधारणा के द्वारा समस्त विश्व के मुसलमानों के मध्य एक वातावरण बना दिया है कि इस्लाम खतरे में है और उसे निशाना बनाया जा रहा है। इस प्रचार ने सामान्य मुसलमानों को ध्रुवीकृत किया है और विशेष रूप से नयी पीढ़ी के मुसलमानों को अधिक कट्टरपंथी और मुखर बनाने का कार्य किया है। अल कायदा के इसी अभियान का परिणाम है कि अमेरिका की विदेश नीति और इजरायल तथा अरब देशों का संघर्ष सभी मुसलमानों के मध्य न केवल चर्चा का विषय बन चुका है वरन् आतंकवादियों के आक्रमणों को कुछ हद तक न्यायसंगत ठहराने का माध्यम भी बन चुका है। भारत के विभाजन में भी मजहब का हथियार के रूप में उपयोग हुआ। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना स्वयं परंपरागत रूप से कट्टरवादी मुसलमान नहीं थे। लेकिन उन्हें भी यह समझ में आ गया कि इस हथियार के इस्तेमाल से भारत का बंटवारा संभव है और कोई तर्क काम नहीं कर सकेगा। हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग सम्प्रदाय हैं। दोनों की संस्कृतियां अलग हैं। दोनों अलग-अलग सभ्यताओं की उपज हैं, इसलिए अलग-अलग राष्ट्र हैं। मुस्लिम लीग का तर्क था कि अगर भारत को आजाद होना है तो मुसलमानों के लिए अलग देश की व्यवस्था हो जानी चाहिए। स्वतन्त्रता के पश्चात भारत अपने पड़ोसी देशों के कारण आतंकवाद का दंश झेलने को विवश है। पाकिस्तान हमेशा से ही आतंकवादी संगठनों को प्रश्रय देता रहा है। चीन पाकिस्तान का साथ देकर तथा भारत विरोधी तत्वों को समर्थन देकर अपने निहित स्वार्थ की अभिपूर्ति करता रहा है। पाकिस्तान कश्मीर की तथाकथित आज़ादी के नाम पर विभिन्न आतंकवादी संगठनों को धन तथा प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराता रहा है। एशियाई उपमहाद्वीप में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए चीन भी भारत के खिलाफ पाकिस्तान की सहायता करता रहा है और भारत में आतंकवाद के प्रसार में योगदान करता रहा है। यद्यपि चीन और पाकिस्तान दोनों ही विश्वमंच पर अपनी इस संलिप्तता का खण्डन करते रहे हैं। चीन अरूणाचल प्रदेश के बहाने से भी भारत पर ऑंखें तरेरता रहा है। नेपाल की चतुर्दिक खुली सीमाओं से तथा बांग्लादेश, म्यांमार एवं भूटान से भी आतंकवादियों का प्रवेश हो रहा है। देश के उत्तर पूर्वी राज्यों में उल्फा तथा बोडो आतंकवादी सक्रिय हैं, तो मध्य भारत नक्सली हिंसा से कराह रहा है। दक्षिण में श्रीलंका में चल रही लिट्टे की समस्या के कारण आतंकवादी घटनाओं का खतरा है, तो पश्चिमी तथा भारत पाकिस्तान के निकट होने के कारण आतंकवादियों के हरदम निशाने पर रहता है। मालेगांव बम विस्फोट में हिन्दू उग्रवादियों के शामिल होने की बातसामने आने के बाद आतंकवाद का एक नया कोण विकसित होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। भारत बहुत समय से आतंकवाद का शिकार रहा है। भारत के काश्मीर, नागालैंड, पंजाब, असम, बिहार आदि विशेष रूप से आतंक से प्रभावित रहे हैं। यहाँ कई प्रकार के आतंकवादी है जैसे पाकिस्तानी, इस्लामी, माओवादी, नक्सली, हिंदू आतंक, सिख आदि। जो क्षेत्र आज आतंकवादी गतिविधियों से लम्बे समय से जुड़े हुए हैं उनमें जम्मू-कश्मीर, मुंबई, मध्य भारत (नक्सलवाद) और सात बहन राज्य (उत्तर पूर्व के सात राज्य) (स्वतंत्रता और स्वायत्तता के मामले में) शामिल हैं। अतीत में पंजाब में पनपे उग्रवाद में आंतकवादी गतिविधियां शामिल हो गयीं जो भारत देश के पंजाब राज्य और देश की राजधानी दिल्ली तक फैली हुई थीं। 2006 में देश के 608 जिलों में से कम से कम 232 जिले विभिन्न तीव्रता स्तर के विभिन्न विद्रोही और आतंकवादी गतिविधियों से पीड़ित थे। अगस्त 2008 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन का कहना था कि देश में 800 से अधिक आतंकवादी गुट सक्रिय हैं और 2014 तक देश में 800 से अधिक आतंकवादी गुट सक्रिय हैं। भारत में कुछ विषय ऐसे हैं इनका हर दृष्टि से अत्यधिक महत्व है, लेकिन उनके बारे में चर्चा को लेकर एक विशेष प्रकार का वातावरण बना रहता है। किसी भी लोकतांत्रिक देश या सभ्यता के लिये यह अति आवश्यक है कि सभी विषयों पर खुलकर बहस और चर्चा होनी ही चाहिए। भारत में सेक्युलरिज्म और हिंदू-मुस्लिम संबंध ऐसे विषय हैं, जिन पर खुली चर्चा करने से हर कोई बचना चाहता है। 1857 के विद्रोह के उपरांत जिस प्रकार ब्रिटिश साम्राज्य ने मुस्लिम समुदाय को आर्थिक और प्रशासनिक आधार पर अलग-थलग किया और एक समग्र राष्ट्रवाद की अवधारणा को खण्डित करते हुए भारत में मुसलमानों को एक पृथकता का भाव प्रदान किया, उसी से विवश होकर सर सैयद अहमद खां जैसे मुस्लिम सुधारकों को पूरे पुनर्जागरण काल को पृथकता के आधार पर ही परिभाषित करना पड़ा। वास्तव में आधुनिक काल में हिंदू-मुस्लिम संबंधों की इसी पृष्ठभूमि में वर्तमान उत्तर आधुनिक काल के संबंधों की व्याख्या की जा सकती है। पूरे स्वाधीनता संग्राम के दौरान ब्रिटिश शासकों ने पूरे भारत को ब्रिटिश भारत, रजवाड़ों के राज्य, आदिवासी, दलित, भाषाई अल्पसंख्यक जैसी अवधारणाओं में रखना शुरू किया तो उसी दौरान मुस्लिम को भी एक अलग स्वायत्त संस्कृति के रूप में स्थापित करने का प्रयास हुआ। आज जब हम उत्तर आधुनिक काल में हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर चर्चा करते हैं तो हमें इसी ऐतिहासिक भूल को सुधारने की दिशा में कार्य करना चाहिये। 1989 में देश में चले हिंदुत्व आंदोलन के बाद देश में हिंदू-मुस्लिम संबंधों का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज हिंदू-मुस्लिम संबंधों का जो स्तर है, उसे देखते हुए सीख लेते हुए मुस्लिम समाज को चाहिये कि वह वैश्विक संदर्भ में इस्लाम और मुस्लिम स्थिति का आकलन करते हुए इस सत्य को स्वीकार करे कि भारत से बेहतर स्थिति उसके लिये और कहीं नहीं है । यह कार्य इतना सहज नहीं है लेकिन भारत को विश्व पटल पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित होने के लिये हिंदू-मुस्लिम संबंधों में सहजता आवश्यक है। हिंदू और मुस्लिम सौहार्द्र की दिशा में सभी को एक इकाई मानकर चलने से समान आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक अवसर प्राप्त होते हैं। यह भी साफ है कि हज, नमाज, रोजा जैसे प्रमुख इस्लामी सिद्धांतों का पालन करते हुए एक मुसलमान उसी तरह सेक्युलर और आधुनिक नागरिक के रूप में देश की मुख्यधारा के साथ जुड़ा रह सकता है, जैसे कि कोई अन्य। हिंदू-मुस्लिम एक हजार वर्षों से भारत में एक साथ रह रहे हैं। भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंध को सुदृढ़ बनाने के लिए आवश्यक है कि वह एक-दूसरे को मानवता के आधार पर जीने की आजादी दें। अपना भला चाहें, दूसरों का भला करें और यह दुश्मन बनकर संभव नहीं। आज भारत की राजनीति हिंदू-मुस्लिमों को बांटने का काम कर रही है। राजनीति में शीर्ष पर बैठे लोग चोरों, डकैतों को राजनीति में ला रहे हैं। मीडिया को खरीदकर वह देश में विकास दिखा रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं हो रहा। आज धर्म एवं जाति के नाम पर वोटिंग हो रही है और ऐसे वातावरण में भाईचारा बनाना कठिन है। आज भारतीय विचारधारा महत्वहीन होती जा रही है और आयातित विचारधारा को शामिल किया जा रहा है।
आज भारतीय विचारधारा महत्वहीन होती जा रही है और आयातित विचारधारा को शामिल किया जा रहा है। हालांकि भारत में अभी भी एकता कायम है। भारत ही एक ऐसा देश है जहां हिंदू, मुस्लिम व अन्य सभी समुदाय के लोग साथ मिलकर रहते हैं और आगे भी रहेंगे। मुस्लिम समुदाय हिंदुओं को अपना समझते हैं और उन्हें हिंदुओं का सहयोग चाहिए। सभी को समान अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिएं, तभी देश में भाईचारे का वातावरण बन सकेगा। हिंदुस्तान धर्मों का अजायब-घर है। यहां की मिट्टी में यह शामिल है कि सभी एक-दूसरे के साथ आपस में मिल-जुल कर रहें। लेकिन हमें इस बात से कभी इंकार नहीं होना चाहिए कि कोई भी रिश्ता सच्चाई की बुनियाद पर ही आगे बढ़ सकता है। ऐसी सारी बातें जो सुनने में तो अच्छी लगती हों, लेकिन उन्हें दिल से स्वीकार नहीं किया जाए तो ऐसे में वो रेत के घरौंदे से ज्यादा अहमियत नहीं रखतीं। एकता के लिए सबसे अहम पहलू यह है कि जिस तरह से हम अपने धर्म को अहम समझते हैं, वैसा ही आदर हमें दूसरों के धर्म का भी करना होगा। चाहे हम होली या ईद एक साथ न मना पा रहे हों, लेकिन हमारी वजह से किसी की खुशियों में रुकावट किसी भी हालत में नहीं आनी चाहिए। किसी भी मामले में एकता हमारे लिए काफी अहमियत रखती है। ऐसे में हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में इंसान और इंसानियत की इज्जत सिखाने की जरूरत है। इस देश में हिंदू- मुस्लिम एकता व्यवहारिक तौर पर पूरी तरह से आज भी कायम है। आपको जो कहीं थोड़ा सा उन्माद नजर आता है, या कहीं बीच में थोड़ी सी दरार नजर आती है, वो असल में कुछ ऐसे तत्व हैं, जो इस देश के दुश्मन माने जा सकते हैं। अगर हिंदू-मुस्लिम एक नहीं होते तो ये देश ही एक नहीं रह पाता। और 1947 में विभाजन की जो दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, उसके लिए जनमानस जिम्मेदार नहीं, बल्कि एक विशेष वर्ग जिम्मेदार है। बिल्लियों के बीच जो बंदर था, उसने सारा मामला खराब किया। ब्रिटिश साम्राज्य ने सारा मामला खराब किया। आज भी देश की हर दरगाह पर हमारे हिंदू भाई तकरीबन उसी संख्या में आते हैं, जितनी संख्या में मुसलमान।
हिंदू-मुस्लिम एकता को खत्म करने के लिए देश की आजादी के समय ही अंग्रेजों ने पाकिस्तान की बुनियाद रखकर बीज बो दिया था। उस बीज से पैदा और उस पौधे को कांटेदार दरख्त बनाने के काम को आरएसएस व उसके संगठनों ने पूरी तरह अंजाम दिया। 1990 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के नाम पर रथयात्रा शुरू कर हिंदू-मुस्लिम के बीच की दूरियों को और अधिक करने की कोशिश की और अपने भाषणों के जरिए पूरे देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया, जिसमें निर्दोष लोगों की जानें भी गईं। 6 दिसंबर, 1992 में जो कुछ अयोध्या में हुआ या उसके उपरांत फरवरी, 2002 में जो कुछ हमने गुजरात में देखा, वो अपवाद हैं, और उन तमाम घटनाओं के विरूद्ध जो आज तक संघर्ष कर रहे हैं, उनमें 90 प्रतिशत हिंदू जगत से संबंधित हैं। बहरहाल, जैसे-जैसे शिक्षा आती जाएगी, हम थोड़ा आर्थिक रूप से और संपन्न होते जाएंगे, वैसे-वैसे हमारे संबंध और मजबूत होते जाएंगे और भविष्य बेहतर होगा। अब देश के युवा वर्ग को चाहिए कि वो हिंदुस्तान को विकास के मार्ग पर ले जाते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूती देने के लिए एकता के दुश्मन नेताओं को मुंह-तोड़ जवाब दे और देश की नई नस्ल के सामने यह प्रस्ताव रखे कि हिंदू-मुस्लिम एकता से ही हम सबकी भलाई है। इस बात से किसी को भी इंकार नहीं है कि एकता में असीम शक्ति होती है। जो काम हम आपस में मिल-जुलकर कर सकते हैं, वो काम तन्हा कभी भी नहीं किया जा सकता। हमने देखा है कि किस प्रकार दुर्गा पूजा, ईद या होली हिंदू-मुस्लिम दोनों साथ मिलकर मनाते हैं। लेकिन अफसोस, हमारी मीडिया और आतंकवाद हमारे दिलों के बीच दूरियां बढ़ाने के काम में लगातार लगे हुए हैं। समाज को बांटने में हर धर्म के लोग लगे हैं। ऐसे तत्व दोनों तरफ मौजूद हैं, जो अपने मकसद के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन्हें तो मासूमों का मारा जाना जश्न जैसा लगता है। लेकिन ये कभी ये सोचने की कोशिश नहीं करते कि आखिर हमारे देश के नौजवान अगर आतंकवादी या नक्सलवादी बन रहे हैं तो इसके पीछे के कारण क्या हैं? हमें इस ओर जरूर सोचना पड़ेगा। नहीं तो समाज लगातार बंटता रहेगा, और बांटने वाले अपना राजनैतिक, आर्थिक और धार्मिक लाभ लेते रहेंगे। इसलिए हमें ऐसा वातावरण बनाने की जरूरत है, ताकि सब साथ मिल कर रह सकें। एक-दूसरे को करीब से जान सकें। एक-दूसरे के धर्म को समझ सकें। हिंदू-मुस्लिम संबंध को राजनीतिक स्तर पर सुधारने की जरुरत है। सामाजिक स्तर पर यह एकजुट है, सुधरा हुआ है। यह टूटता तभी है, जब इस पर राजनीति हावी हो जाती है। आजादी के बाद से ही हमारा देश राजनीतिक दलों द्वारा शासित रहा है, जो खुद को धर्मनिरपेक्षता का रखवाला मानते हैं। वह मुस्लिमों को यह अहसास कराने का कोई मौका नहीं छोड़ते कि समाज में उनका अस्तित्व उनके दल के अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ है। अपनी बात का सत्यापन करने के लिए वह उनके सामने विपक्षी दल की तस्वीर बनाते हैं कि अगर वह सत्ता में आ गए तो मुस्लिमों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इसीलिए मुस्लिम समुदाय का कार्य उनकी पार्टी को सत्ता में लाना होता है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने हम सबकी आंखें खोल दीं। अपने वोट बैंक के लिए यह मुस्लिम समुदाय को भय में डालते हैं। यही नीतियां सामाजिक व आर्थिक तौर पर अलगाव पैदा करती हैं। यदि राजनीतिज्ञ हिंदू-मुस्लिम के बीच में न पड़ें तो दोनों समुदाय सद्भाव से रहने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे, लेकिन लोकतांत्रिक देश होने के नाते हम राजनीति को सामाजिक व्यवस्था से नहीं हटा सकते। इसीलिए इस स्थिति को बदलने के लिए राजनीति का चेहरा बदलना जरूरी है। हमें अपने बीच की उन रुकावटों को तोड़ना होगा, जो हमें कमजोर करने के लिए बनाई गई हैं। हमें संविधान की उन खामियों को बदलना होगा, जिनका फायदा राजनीति में सक्रिय निहित स्वार्थी तत्व उठा रहे हैं। हमें सदा याद रहे कि जनता के लिए संविधान होता है, संविधान के लिए जनता नहीं होती है। संविधान की सार्थकता जनता की खुशहाली में है।
भारत में हिन्दू आतंकवाद भी पैर पसार चुका है जो उतना ही खतरनाक है जितना कि मुस्लिम आतंकवाद। भारत में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनके हिन्दू कनेक्शन भी साबित हुआ है। अजमेर शरीफ बमकाण्ड राजस्थान आतंकवादी निरोधी दस्ते (एटीएस) द्वारा दायर आरोपपत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के केन्द्रीय पदाधिकारी इन्द्रेश के नाम का जिक्र आया था।बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। मीडिया की रिपोर्टें बताती हैं कि 11 अक्टूबर 2007 को अजमेर शरीफ दरगाह में जो आतंकवादी बम विस्फोट हुआ था, उसके लिए जिम्मेदार लोगों में इंद्रेश कुमार अकेले ही नहीं हैं जो आर एस एस से जुड़े हुए हैं। आज भी महाराष्ट्र पुलिस के रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एसएम मुशरिफ समेत यह मानने वालों का वर्ग है जो कहता है कि 26/11 की आतंकी वारदात मुस्लिम आतंकवादियों की बजाय हिन्दू आतंकवाद को बेनकाब होने से बचाने के लिए खुफिया संस्थाओं का आपरेशन था। मुंबई उच्च न्यायालय ने हेमंत करकरे आदि की मृत्यु के मामले की जांच के लिए एक जनहित याचिका दायर हुई है। न्यायपालिका ने 26/11 के मामले में विभिन्न देशी विदेशी जांच एजंसियों के जांच करने के बाद भी इसलिए जनहित याचिका स्वीकार करली है क्योंकि उस याचिका में करकरे की मौत पर सवाल उठाये गये हैं। करकरे को हिन्दू आतंकवादियों की जांच के नायक के रूप में पेश करने के लिए मालेगांव में उनकी स्मृति में कई नामकरण हुए हैं। करकरे के कार्यकाल में समझौता एक्सप्रेस बमकाण्ड के लिए कर्नल पुरोहित द्वारा सेना के भण्डार से आरडीएक्स आपूर्ति का आरोप लगाया गया था। 8 सितंबर 2008 के मालेगांव के आतंकवादी बम विस्फोट के कुछ ही सप्ताह बाद, महाराष्ट्र ए टी एस ने इस कांड के सिलसिले में एक साध्वी तथा एक सेवारत सैन्य अधिकारी समेत, ग्यारह लोगों को आरोपित किया था। हाल के दौर में यह पहला ही मौका था जब राष्ट्रविरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों के इतने सारे लोगों को पकड़ा गया था। उसके बाद से अजमेर बमकांड की सी बी आइ तथा राजस्थान ए टी एस की जांच के आधार पर ही मौजूदा चार्जशीट दायर की गयी। जांच के क्रम में अजमेर बम विस्फोट के सूत्र, 18 मई 2007 को हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए आतंकवादी बम विस्फोट से भी जुड़ते नजर आए। संदेह यह भी है कि इन आतंकवादी हमलों के सूत्र दिल्ली-लाहौर समझौता एक्सप्रैस में 18 फरवरी 2007 को हुए बम विस्फोट तक भी फैले हो सकते हैं।
आतंकवाद शुद्घ रूप से राष्ट्रविरोधी होता है और इसलिए देश को उसे जरा भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है। आतंकवाद के सभी रंग एक-दूसरे के लिए खाद-पानी जुटाने का ही काम करते हैं और इस तरह एक-दूसरे को मजबूत करते हैं तथा देश की एकता व अखंडता को कमजोर करने का ही काम करते हैं। इसलिए, देश के हित में यह बहुत ही जरूरी है कि मौजूदा छान-बीन को बिना किसी रोक-टोक के आगे बढ़ाया जाए और इस क्रम में जो भी व्यक्ति और संगठन दोषी पाए जाते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। यह अच्छा हुआ कि संघ ने तथाकथित ‘हिंदू आतंकवादियों’ से अपने को अलग कर लिया और हिंसक गतिविधियों की खुली निंदा की। यदि वह ऐसा नहीं करता तो उसकी दशा भी हमारे वामपंथियों की तरह हो जाती, जो माओवादियों को बचाने की प्रच्छन्न कोशिश करते हैं। कुछ साल पहले देश में आयी बम धमाकों की बाढ़ के पीछे कभी लश्कर-ए-तोएबा का तो कभी इंडियन मुजाहिदीन का तो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का नाम लिया जाता रहा।
इंडियन मुजाहिदीन का ओर-छोर भी आज तक खुफिया एजेंसियां पता नहीं लगा सकी है। मालेगांव, समझौता एक्सप्रैस, हैदराबाद की मक्का मस्जिद और अजमेर की दरगाह पर हुए विस्फोट और कानपुर, नांदेड़ आदि में संघ के कई कार्यकताओं के बम बनाते हुए विस्फोट में मारे जाने के बाद खुफिया एजेंसियों को शक हुआ था कि इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तोयबा की आड़ में कोई और भी बम धमाके करने में लिप्त हो सकता है। तब कुछ लोगों ने भी आशंका जाहिर की थी कि कहीं कोई और ही तो नहीं बम धमाके कर रहा है। दुनिया के सभी धर्मों के भी सभी लोग आतंकवादी नहीं हो सकते। हां, कुछ लोग जरुर गुमराह हो सकते हैं। यही बात हिन्दुओं पर भी लागू होती है और मुसलमानों पर भी। कुछ लोगों की गलत हरकतों की वजह से न तो पूरा समुदाय जिम्मेदार हो सकता है और न ही धर्म। हिन्दुओं में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो आतंकवादी घटनाओं में लिप्त पाए गए हैं।जब आरएसएस बम धमाकों के आरोपियों के पक्ष में बोलकर यह कहता है कि हिन्दुओं को बदनाम किया जा रहा है तो वह देश के तमाम हिन्दुओं को इमोशनल ब्लैकमेल करके उन्हें अपनी ओर लाना चाहता है। आरएसएस इस बात को भी समझ ले कि वह इस देश के 85 प्रतिशत हिन्दुओं का अकेला प्रतिनिधि नहीं है। इस देश का बहुसंख्यक हिन्दु सैक्यूलर है। हिन्दुओं ने ही बम धमाकों में शामिल हिन्दुओं के चेहरे बेनकाब किए। हिन्दुओं ने ही बाबरी मस्जिद विध्वंस पर अफसोस और गुस्सा जताया था। क्या आतंक का कोई रंग होता है? कोई मजहब होता है? होता तो नहीं है, लेकिन मुख-सुख के लिए लोग उसका वैसा नामकरण कर देते हैं। यह नामकरण बड़ा विनाशकारी सिद्ध होता है। कुछ सिरफिरों का उन्माद उनसे संबंधित सारे समुदाय के लिए कलंक का टीका बन जाता है। यह टीका कभी सिखों के सिर पर लगा, कभी मुसलमानों के और अब यह हिंदुओं के सिर पर लग रहा है। हमारे स्वाधीनता संग्राम के अनेक महान सेनानी जैसे सावरकर, चाफेकर बंधु, भगतसिंह, बिस्मिल, आजाद वगैरह ने भी हिंसा का सहारा लिया, लेकिन हम उन्हें कभी आतंकवादी नहीं मान सकते। इसके कई कारण हैं। पहला तो उनकी हिंसा सिर्फ विदेशी शासकों तक सीमित थी। उनकी कोशिश होती थी कि किसी भी भारतीय का खून नहीं बहे, लेकिन दुनिया के ज्यादातर आतंकवादी अपने ही लोगों की हत्या सबसे ज्यादा करते हैं। कश्मीरी आतंकवादियों ने सबसे ज्यादा किनको मारा? क्या कश्मीरियों और मुसलमानों को नहीं? तालिबान किनको मार रहे हैं? सबसे ज्यादा वे पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मुसलमानों को मार रहे हैं। श्रीलंका के उग्र आतंकवादियों ने सिंहलों के साथ-साथ तमिल नेताओं को मारने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत के आतंकवादी चाहे वे सिख हों या मुसलमान या हिंदू, क्या उन्होंने कोई ऐसा बम बनाया है, जिससे सिर्फ पराए लोग ही मारे जाएं और उनके अपने लोग बच जाएं? हमारे माओवादी क्या कर रहे हैं? वे सबसे ज्यादा मार्क्स वादियों को ही मार रहे हैं। सब कुछ अपनी रफ्तार से चलते रहता है, फिर कोई ऐसी घटना घट जाती है, जिससे पूरा देश दहल उठता है। कुछ दिन तक बड़ी-बड़ी बातें होती हैं और फिर जीवन अपनी पटरी पर लौट आता है। देश में आतंकवाद को लेकर कुल मिलाकर दृश्य कुछ इस तरह का है। न तो हम समस्या की गंभीरता को पहचान पा रहे हैं और न उसकी जड़ में जाने की कोई ईमानदार कोशिश ही नजर आती है।
हमारे क्रांतिकारी बम फेंककर कायरों की तरह जान बचाते नहीं फिरते थे। वे हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाते थे। पकड़े जाने पर वे मानवाधिकार या वकीलों या नोबेल लॉरिएटों की शरण में नहीं जाते थे। वे पहले शेर की तरह दहाड़कर बाद में चूहे की मुद्रा धारण नहीं करते थे। यह कितनी शर्म की बात है कि कुछ बेकसूर नौजवान जेल में सिर्फ इसलिए सड़ रहे हैं कि वे मुसलमान हैं? आतंकवाद कोई करे, किधर से भी करे, मरने वाले सब लोग बेकसूर होते हैं। सारे आतंकवादियों की जात एक ही है और सारे मरनेवालों की भी जात एक ही है। इसीलिए आतंकवाद का जवाब आतंकवाद कभी नहीं हो सकता जसे कि मूर्खता का जवाब मूर्खता नहीं हो सकती। देश का यह बड़ा दुर्भाग्य होगा कि आतंकवाद पर राजनीति की जाए। जिस तरह भ्रष्टाचार सबके लिए निंदनीय है, वैसे ही आतंकवाद भी होना चाहिए। आतंकवाद और भ्रष्टाचार, ये दोनों दैत्य देश के दुश्मन हैं। इन्हें मार भगाने के लिए सभी राजनीतिक दल, सभी नेता, सभी संप्रदाय, मजहब, प्रांत, सभी धर्मध्वजी एकजुट नहीं होंगे तो देश अंदर से खोखला और बाहर से जर्जर होता चला जाएगा। आतंकवाद को न तो रंगों में बांटा जा सकता है और न ही हमारे और तुम्हारे खांचों में! यह बंटवारा नहीं, राजनीति है। आतंकवाद का समूलोच्छेद तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि उसे संपूर्ण राष्ट्र का समान शत्रु न माना जाए। समाज में जिस गति से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ता है उसी गति से समाज टूटता भी है। सरकार का पहला काम अलगाव की इन वजहों को खत्म करना होना चाहिए।
[लेखक रक्षा एवं सैन्य मामलों के विशेषज्ञ हैं] लेखक के बारे में आसिफ अहमद असिस्टेंट प्रोफेसर रक्षा एवं सामरिक अध्ययन, राजनीति विज्ञान, कला संकाय भवन, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र-136119, (हरियाणा) भारत. - See more at: http://hindi.kohram.in/my-opinion/spreading-radical-terrorism-in-india-and-hindu-muslim-relational-problem/#sthash.QG3pGKEL.dpuf

Tuesday, July 15, 2014

Department of Defence and Strategic Studies to be upgraded: Government


Department of Defence and Strategic Studies to be upgraded: Government---------------By PTI | 14 Jul, 2014, 07.03PM IST--------------------------------------------------------------------------------------------------- NEW DELHI: The Department of Defence and Strategic Studies will be upgraded to Department of National Security Studies in five universities during the 12th plan period, Rajya Sabha was informed today. "The UGC has decided to upgrade department of defence and strategic studies to department of national security studies in five universities...," HRD MinisterSmriti Irani told Rajya Sabha. In a written reply, she said the five universities are - University of Allahabad, University of Madras, University of Pune, University of Manipur and University of Punjab. A model syllabus for national security studies at the post graduate level has also been developed, based on the recommendations of an expert committee to review the existing syllabus of defence and strategic studies at the under graduate, post graduate, M.Phil and Ph.D levels, the Minister said. Read more at: http://economictimes.indiatimes.com/articleshow/38378646.cms?utm_source=contentofinterest&utm_medium=text&utm_campaign=cppst..

Sunday, May 25, 2014

Interesting Facts about India- Love India-Live Indian


Interesting Facts about India-------------------------------------- India is sure known as the most cultural rich country in the world, with it’s huge history and civilisation, India is a country that one just can not live without visiting it,There is so much in India, that if one decides to visit at least all the temples and cultural heritages in India it can take more than a decade of one’s life in just visiting them,likewise there are many reasons and facts that make India a sure place to visit, So here we bring some of the 20 most amazing and interesting facts about India, which will not only amaze you but it will also make you to visit India at least once in your lifetime--------------------------------- When many cultures were only nomadic forest dwellers over 5000 years ago, Indians established Harappan culture in Sindhu Valley (Indus Valley Civilization)-------------------- The name 'India' is derived from the River Indus, the valleys around which were the home of the early settlers. The Aryan worshippers referred to the river Indus as the Sindhu.---------------------- The Persian invaders converted it into Hindu. The name 'Hindustan' combines Sindhu and Hindu and thus refers to the land of the Hindus. ------------------------------------ Chess was invented in India. ------------------------ Algebra, Trigonometry and Calculus are studies, which originated in India. --------------------- The 'Place Value System' and the 'Decimal System' were developed in India in 100 B.C. ------------------ The World's First Granite Temple is the Brihadeswara Temple at Tanjavur, Tamil Nadu. The shikhara of the temple is made from a single 80-tonne piece of granite. This magnificent temple was built in just five years, (between 1004 AD and 1009 AD) during the reign of Rajaraja Chola. -------------------- India is the largest democracy in the world, the 7th largest Country in the world, and one of the most ancient civilizations. ------------ The game of Snakes & Ladders was created by the 13th century poet saint Gyandev. It was originally called 'Mokshapat'. The ladders in the game represented virtues and the snakes indicated vices. The game was played with cowrie shells and dices. In time, the game underwent several modifications, but its meaning remained the same, i.e. good deeds take people to heaven and evil to a cycle of re-births. ---------------- The world's highest cricket ground is in Chail, Himachal Pradesh. Built in 1893 after leveling a hilltop, this cricket pitch is 2444 meters above sea level.-------------------------- India has the largest number of Post Offices in the world. ----------------- The largest employer in India is the Indian Railways, employing over a million people. ----------------- The world's first university was established in Takshila in 700 BC. More than 10,500 students from all over the world studied more than 60 subjects. The University of Nalanda built in the 4th century was one of the greatest achievements of ancient India in the field of education. ---------------------------------------------------------- Ayurveda is the earliest school of medicine known to mankind. The Father of Medicine, Charaka, consolidated Ayurveda 2500 years ago. India was one of the richest countries till the time of British rule in the early 17th Century. Christopher Columbus, attracted by India's wealth, had come looking for a sea route to India when he discovered America by mistake. The Art of Navigation & Navigating was born in the river Sindh over 6000 years ago. The very word Navigation is derived from the Sanskrit word 'NAVGATIH'. The word navy is also derived from the Sanskrit word 'Nou'. Bhaskaracharya rightly calculated the time taken by the earth to orbit the Sun hundreds of years before the astronomer Smart. According to his calculation, the time taken by the Earth to orbit the Sun was 365.258756484 days. The value of "pi" was first calculated by the Indian Mathematician Budhayana, and he explained the concept of what is known as the Pythagorean Theorem. He discovered this in the 6th century, long before the European mathematicians. Algebra, Trigonometry and Calculus also originated in India.Quadratic Equations were used by Sridharacharya in the 11th century. The largest numbers the Greeks and the Romans used were 106 whereas Hindus used numbers as big as 10*53 (i.e. 10 to the power of 53) with specific names as early as 5000 B.C.during the Vedic period.Even today, the largest used number is Terra: 10*12(10 to the power of 12). -------------------------------------------------- Until 1896, India was the only source of diamonds in the world (Source: Gemological Institute of America). ----------------------------------------------- The Baily Bridge is the highest bridge in the world. It is located in the Ladakh valley between the Dras and Suru rivers in the Himalayan mountains. It was built by the Indian Army in August 1982. ----------------------------------------------- Sushruta is regarded as the Father of Surgery. Over2600 years ago Sushrata & his team conducted complicated surgeries like cataract, artificial limbs, cesareans, fractures, urinary stones, plastic surgery and brain surgeries. ============ Usage of anaesthesia was well known in ancient Indian medicine. Detailed knowledge of anatomy, embryology, digestion, metabolism,physiology, etiology, genetics and immunity is also found in many ancient Indian texts. ------------------------ India exports software to 90 countries. The four religions born in India - Hinduism, Buddhism, Jainism, and Sikhism, are followed by 25% of the world's population. Jainism and Buddhism were founded in India in 600 B.C. and 500 B.C. respectively. -------------------------------------------------------------------------------- Islam is India's and the world's second largest religion. There are 300,000 active mosques in India, more than in any other country, including the Muslim world. ================================================================== The oldest European church and synagogue in India are in the city of Cochin. They were built in 1503 and 1568 respectively. Jews and Christians have lived continuously in India since 200 B.C. and 52 A.D. respectively ======================================================================= The largest religious building in the world is Angkor Wat, a Hindu Temple in Cambodia built at the end of the 11th century. The Vishnu Temple in the city of Tirupathi built in the 10th century, is the world's largest religious pilgrimage destination. Larger than either Rome or Mecca, an average of 30,000 visitors donate $6 million (US) to the temple everyday. ======================================================================= Sikhism originated in the Holy city of Amritsar in Punjab. Famous for housing the Golden Temple, the city was founded in 1577. Varanasi, also known as Benaras, was called "the Ancient City" when Lord Buddha visited it in 500 B.C., and is the oldest, continuously inhabited city in the world today. ================================================================== India provides safety for more than 300,000 refugees originally from Sri Lanka, Tibet, Bhutan, Afghanistan and Bangladesh, who escaped to flee religious and political persecution. ========================================================================= His Holiness, the Dalai Lama, the exiled spiritual leader of Tibetan Buddhists, runs his government in exile from Dharmashala in northern India. ============================================================================ Martial Arts were first created in India, and later spread to Asia by Buddhist missionaries. Yoga has its origins in India and has existed for over 5,000 years. ======================================================================================================================== There are hundreds and thousands of such facts about India which is not possible to cover-up in just one single post, As for now we have listed the top most amazing facts about India, which we can confidently say is all, 100% true and genuine, But still if you think that we have missed any of the amazing facts about India or if you want to share your amazing facts about India, then feel free to write your facts in the comment box down below. ======================================================================

List of Fake Universities Not Recognized by UGC 2014


List of Fake Universities Not Recognized by UGC 2014 State-wise List of fake Universities as in may, 2014 (Hindi Version) Bihar 1. Maithili University/Vishwavidyalaya, Darbhanga, Bihar. Delhi 2. Commercial University Ltd., Daryaganj, Delhi. 3. United Nations University, Delhi. 4. Vocational University, Delhi. 5. ADR-Centric Juridical University, ADR House, 8J, Gopala Tower, 25 Rajendra Place, New Delhi - 110 008. 6. Indian Institute of Science and Engineering, New Delhi. Karnataka 7. Badaganvi Sarkar World Open University Education Society, Gokak, Belgaum, Karnataka. Kerala 8. St. John’s University, Kishanattam, Kerala. Madhya Pradesh 9. Kesarwani Vidyapith, Jabalpur, Madhya Pradesh. Maharashtra 10. Raja Arabic University, Nagpur, Maharashtra. Tamil Nadu 11. D.D.B. Sanskrit University, Putur, Trichi, Tamil Nadu. West Bengal 12. Indian Institute of Alternative Medicine, Kolkatta. Uttar Pradesh 13. Varanaseya Sanskrit Vishwavidyalaya, Varanasi (UP) Jagatpuri, Delhi. 14. Mahila Gram Vidyapith/Vishwavidyalaya, (Women’s University) Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh. 15. Gandhi Hindi Vidyapith, Prayag, Allahabad, Uttar Pradesh. 16. National University of Electro Complex Homeopathy, Kanpur, Uttar Pradesh. 17. Netaji Subhash Chandra Bose University (Open University), Achaltal, Aligarh, Uttar Pradesh. 18. Uttar Pradesh Vishwavidyalaya, Kosi Kalan, Mathura, Uttar Pradesh. 19. Maharana Pratap Shiksha Niketan Vishwavidyalaya, Pratapgarh, Uttar Pradesh. 20. Indraprastha Shiksha Parishad, Institutional Area,Khoda,Makanpur,Noida Phase-II, Uttar Pradesh. 21. Gurukul Vishwavidyala, Vridanvan, Uttar Pradesh. * Bhartiya Shiksha Parishad, Lucknow, UP - the matter is subjudice before the District Judge - Lucknow www.ugc.ac.in Note: So be aware of fake universities and choose the better university for your higher education to make your future bright and secure.

Thursday, April 17, 2014

Post Graduate course through distance mood in Defence and Strategic Studies in India


Post graduate course MA in defence and strategic studies from kurukshetra university kurukshetra, Currently in India only KUK offers this masters course through distance education mode and as a regular course in both ways, Candidates can apply for next academic year, term course all details are or will available on kuk website kuk.ac.in NEXT SESSION COURSES DETAILS AVAILABLE ON WEBSITE MAY BE AFTER MAY EXAMS YOU CAN FOLLOW DEFENCE & STRATEGIC STUDIES, KURUKSHETRA UNIVERSITY KURUKSHETRA GROUP ON FACEBOOK "The aim of military study should be to maintain a close watch upon the latest technical, scientific and political developments, fortified by a sure grasp of the eternal principles upon which the great captain's have based their contemporary methods, and inspired by a desire to be ahead of any rival army in securing option's for the future" -Sir Basil Liddell Hart- ---------------------------------------------Increasingly, many of us find ourselves in appointments where we are required to articulate the case for Indian defence policy, the Armed Forces, command and control organisations, procurement and management issues and so on. It is a long list of challenges and requires thought, awareness and, above all, knowledge of why the world is the way it is. Defence Studies expose the individuals to an in-depth analysis of contemporary events and issues in this multilateral, unpredictable world. Global conflict and the threat of war has been a concern for all nations for several decades. Internal and regional political instability, economic turmoil and poor international relations have bothered all governments. While diplomacy plays an integral role in maintaining peace in a region, internal security and preparedness for combat are issues that are an integral part of governance. Defense studies, also known as war studies, defense and strategic studies, military science or national security studies, as an academic discipline is assuming significance as we need trained planners, strategists and analysts(Ahmed, Asif). Until the 1980s, Security & Strategic Studies was seen as the discipline responsible for the study of security issues, back then reduced to military affairs. Since then, Security Studies has become, particularly in Europe, a more common label to indicate the discipline responsible for the study of security. Since the late 1980s, there has been a remarkable change in the way security is conceived, studied and practiced. The academic field of Security Studies has been the subject of intense academic, intellectual and political debate during this period. The main aim of this course is to introduce students to main debates in Security Studies by tracing the development of Security Studies from its Cold War past to its post-Cold War present and opening up alternative ways of thinking about the future. A dash of history stirred into political science sprinkled with a liberal dose of strategy — intrigued by this recipe? Then Defence and Strategic Studies is a territory which you must explore. After World War II, there was a great deal of interest in national security issues worldwide. During this period, the Defence and Strategic Studies course was first introduced in India. After independence, India has faced many ebbs and flows in the fields of defence and developments. Wars with Pakistan and lost to China in 1962 highlighted the neglence and unawareness of the India’s security policy. These events also encouraged the Indian policy makers a reassessment of Indian foreign and defence policy, as a result the Indian policymakers were inspired the need to study security issues in order to learn from past mistakes. Our decision makers within the exception of very few, lack adequate knowledge of defence and security matters. Although our political leadership exercise greater care in their utterance on defence and security matter’s, these are essentially confined to generalities and is not the outcome of a well though out policy. There is a lack of a well informed public opinion on defence and security related matters. In the absence of a well define defence policy in India; this state of affairs is likely to continue. So these require a sound background based on study, research and in depth understanding. Never treat the subject matter of defence like mathematics, political science or economics where hypotheses, theorems, canons and schools of thoughts rule the roost? It concerns our very existence as a nation and needs pragmatic treatment. War is said to be much serious a thing to be left to generals, admirals and air marshals; it needs marshalling a national effort, including the academic community, sans the myriad schools of thoughts.

Saturday, April 5, 2014

Book “Science Technology and War” writen by Asif Ahmed released in Senate Hall KUK on 14 March 2014


In the Two-day UGC sponsored National seminar on Changing Dynamics of Indias Neighbourhood Policy on March 14-15 2014 a book “Science Technology and War” written by Mr Asif Ahmed, Assistant Professor in Defence & Strategic Studies, Department of Political Science, Kurukshetra University Kurukshetra. The book released by the main Guests Dr Arvind Gupta, Director General of Institute for Defence Studies and Analyses, New Delhi. Lt Gen Dr DDS Sandhu, PVSM, ADC(Retd.), Vice Chancellor, Kurukshetra University Kurukshetra. Prof. Devendra Kaushik,Former Chairman EC, Maulana Abul Kalam Azad Institute for Asian Studies, Kolkata. Prof.R S Yadav,Head, Department of Political Science and Defence Studies, Kurukshetra University Kurukshetra. All the present guests and delegates from various parts of the countries gave Mr Asif Ahmed congratulations for this achievement. ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में रक्षा एवं सामरिक अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर श्री आसिफ अहमद द्वारा लिखित पुस्तक "विज्ञान प्रौद्योगिकी और युद्ध" को 14-15 मार्च 2014 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के सीनेट हॉल में यूजीसी प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “Changing Dynamics of Indias Neighbourhood Policy” में जारी किया गया। पुस्तक को मुख्य अतिथि डॉ. अरविंद गुप्ता महानिदेशक रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान IDSA नई दिल्ली एवं कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. डीडीएस संधू, पीवीएसएम, एडीसी (सेवानिवृत्त), पूर्व चेयरमैन चुनाव आयोग एवं एशियाई अध्ययन के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद इंस्टीट्यूट कोलकाता के प्रो देवेंद्र कौशिक, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान और रक्षा अध्ययन विभाग प्रमुख प्रो आर.एस.यादव द्वारा जारी किया गया । रक्षा और सामरिक अध्ययन अकादमिक क्षेत्र में आज तक छात्रों के लिए केवल कुछ किताबें उपलब्ध है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में उपस्थित सभी अतिथियों, मेहमान और विद्वानों ने इस उपलब्धि के लिए प्रोफेसर आसिफ अहमद को बधाई दी। ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ਕੁਰੂਕਸ਼ੇਤਰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਕੁਰੂਕਸ਼ੇਤਰ ਦੇ ਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਰਣਨੀਤਕ ਅਧਿਐਨ ਵਿਭਾਗ ਵਿੱਚ ਸਹਾਇਕ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸ਼੍ਰੀ ਆਸਿਫ ਅਹਿਮਦ ਦੀ ਲਿਖੀ ਕਿਤਾਬ " ਸਾਇੰਸ ਤਕਨਾਲੋਜੀ ਅਤੇ ਜੰਗ " ਨੂੰ ਯੂ.ਜੀ.ਸੀ. ਪ੍ਰਾਯੋਜਿਤ ਦੋ ਰੋਜ਼ਾ ਕੌਮੀ ਸੈਮੀਨਾਰ “Changing Dynamics of Indias Neighbourhood Policy” ਵਿਚ 14-15 ਮਾਰਚ 2014 ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਗਿਆ । ਯੂ.ਜੀ.ਸੀ. ਪ੍ਰਾਯੋਜਿਤ ਦੋ ਰੋਜ਼ਾ ਕੌਮੀ ਸੈਮੀਨਾਰ ਦੇ ਮੁੱਖ ਮਹਿਮਾਨ ਡਾ ਅਰਵਿੰਦ ਗੁਪਤਾ ਡਾਇਰੈਕਟਰ ਜਨਰਲ, ਰੱਖਿਆ ਅਧਿਐਨ ਲਈ ਇੰਸਟੀਚਿਊਟ (IDSA) ਨਿਊ ਦਿੱਲੀ ਅਤੇ ਕੁਰੂਕਸ਼ੇਤਰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਉਪ ਕੁਲਪਤੀ ਲੈਫੀਟੀਨੈਟ ਜਨਰਲ ਡੀ.ਡੀ.ਏਸ. ਸੰਧੂ PVSM , ਏ.ਡੀ.ਸੀ. (ਸੇਵਾਮੁਕਤ ) , ਚੋਣ ਕਮਿਸ਼ਨ ਦੇ ਸਾਬਕਾ ਚੇਅਰਮੈਨ ਅਤੇ ਮੌਲਾਨਾ ਅਬੁਲ ਕਲਾਮ ਆਜ਼ਾਦ ਏਸ਼ਿਆਈ ਸਟੱਡੀਜ਼ ਇੰਸਟੀਚਿਊਟ ਕੋਲਕਾਤਾ ਦੇ ਪ੍ਰੋ. ਦੇਵਇੰਦਰ ਕੌਸ਼ਿਕ, ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿਗਿਆਨ ਅਤੇ ਰੱਖਿਆ ਅਧਿਐਨ ਵਿਭਾਗ, ਕੁਰੂਕਸ਼ੇਤਰ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਕੁਰੂਕਸ਼ੇਤਰ ਦੇ ਮੁਖੀ ਪ੍ਰੋ ਆਰ.ਐਸ. ਯਾਦਵ ਨੇ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਸ਼੍ਰੀ ਆਸਿਫ ਅਹਿਮਦ ਦੀ ਲਿਖੀ ਕਿਤਾਬ ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ । ਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਰਣਨੀਤਕ ਅਧਿਐਨ ਵਿਸ਼ੇ ਦੇ ਖੇਤਰ ਵਿੱਚ ਵਿਦਿਆਰਥੀਆ ਲਈ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ ਦੇ ਪੱਧਰ ਤੇ ਚੰਗੀਆ ਕਿਤਾਬਾ ਦੀ ਬਹੁਤ ਕਮੀ ਹੈ । ਇਸ ਕਿਤਾਬ ਤੋ ਪਹਿਲਾ ਸ੍ਰੀ ਆਸਿਫ ਅਹਿਮਦ ਦੀ ਇੱਕ ਪੰਜਾਬੀ ਕਿਤਾਬ ਭਾਰਤ ਦੀ ਕੌਮੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਿਤ ਹੋਈ ਹੈ। ਇਸ ਕੌਮੀ ਸੈਮੀਨਾਰ ਵਿੱਚ ਮੌਜੂਦ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਵੱਖ ਵੱਖ ਹਿੱਸੇ ਤੋ ਆਏ ਸਭ ਮਹਿਮਾਨ ਅਤੇ ਵਿਦਵਾਨਾ ਨੇ ਪ੍ਰੋਫੈਸਰ ਆਸਿਫ ਅਹਿਮਦ ਨੂੰ ਇਸ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਵਧਾਈ ਦਿੱਤੀ ।